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फ़िज़ा बिगड़ गयी है

दंगे फसादों का दामन नहीं छूट रहा, फ़िज़ाएँ बिगड़ गयी हैं मेरे देश में! तिरंगा फहराने पर भी मार काट होती है, शायद बहरूपिये रहने लगे हैं अब इंसानों के भेष में|

आखिर कदम कौन उठायेगा

  मानवता की हदें भी करती, पौरुष की निंदा हैं! ए-नीच तेरे कुकृत्य से सभी पुरुष शर्मिंदा हैं| देख तेरी करतूतों को, हैवानियत की हदें भी करतीं, तेरी कठोर निंदा हैं! जाने कितने फूलों को तूने तोड़ा है, अब मासूम काली को भी नहीं छोड़ा है! तेरा हवस प्रेम देख, दरिंदगी भी तुझ पर कितनी शर्मिंदा है| हाय! तू कैसा दरिंदा है| चिता इन हवस के पुजारियों की जलानी होगी, आग इन व्यभिचारियों को लगानी होगी! कब तलक लुटती रहेंगी…