Declaimer- Strictly 18+ content, read at your own risk. रूह की मौजूदगी क्या कर पायेगी, जिस्मों की सनसनी जब महफ़िल जमायेगी। हैं तैयार दो बदन रुख़सत की शिरकत में, हवस तौर से उतरेगी मोहब्बत की कसरत में। गुनाह माफ़ कर देना अब इनसे तौबा ना होगी, जिस्मानी हसरतें अब हौव्वा ना होगी। लगाकर जाम होठों पर, शौक से मयकशी होगी, फ़ेंक कर लिबास कोने में खूब बेकदरी होगी। जिस्म ऐसे चिपक जाए, जैसे गोंद से जोड़ दिए हों, बदन ऐसे…