Tag: #हिन्दी व्यंग

फ़िज़ा बिगड़ गयी है

दंगे फसादों का दामन नहीं छूट रहा, फ़िज़ाएँ बिगड़ गयी हैं मेरे देश में! तिरंगा फहराने पर भी मार काट होती है, शायद बहरूपिये रहने लगे हैं अब इंसानों के भेष में|

चुनावी मौसम

फिर से लगीं मुजलिसें वहॉं   पर  शमा भी हसीन हो चलीं हैं  वो वीरान सी पड़ी बस्ती में  अब रातों में भी रोशनी जलने लगी हैं  वर्षों से सूखे पड़े दीयों में  तेल जाने  अब  कौन दे रहा है? अब शामें भी खुशनसीब हो चली हैं ! वो पूछ रहा था हाल चाल उन सबसे  जिनके हिस्से की रोटी  वो कबकी डकार चुका है  पूछ रहा है घर के हालात उस गरीब से  जिसके हिस्से के पैसे वो कबसे…