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समाज का लेखकीकरण

वो कहते हैं ना, खुद को कितना भी रंगों में रंग लो, मगर एक दिन पानी पड़ते ही असली रंग दिख ही जाता है| कुछ दिनों से बयार सी चल पड़ी थी देश में शायर लेखकों की , फिर एक दिन आँधी आयी और सबके पत्ते खुल गये| कुछ दिनों से बयार सी चल पड़ी है, कविता ,कहानी लिखने और सुनाने की! इन सबके बीच बढ़ा है, लेखकों का धंधा! कोई नेम के चक्कर में फेमिनिज्म को बाहों में भर…

मतलबी 

मतलबी सी दुनिया है बातें मतलबी सी हैं ! बिल्कुल ऐसे जैसे  बातों में फरेब है  या फिर  फरेब की सी बातें हैं !! मैं भी मतलबी हूं यार तू भी मतलबी है यार, मतलबों की दोस्ती है  या मैं कहुं  दोस्ती में कोई मतलब है छिपा ! मतलबी हर कोई  इंसान है मतलबी सारा जहान है ,  मतलब के लिए रिश्ते हैं  या फिर  रिश्तों में भी मतलब मिला है पता नहीं ये खुद बने थे , या फिर…