Category: Hindi

प्रेम पत्र २(पत्र का जवाब)

जैसा आपने पिछले पत्र में पढा था कि प्रेमिका रूठकर व्यंगपूर्ण पत्र लिखती है और जब यह पत्र उसके प्रेमी को मिलता है तो वो अपनी प्रेमिका को मनाने और भरोसा दिलाने के मकसद से पत्र का प्रेमपूर्ण जवाब लिखता है मगर मस्तिष्क में चलते गणित के कारण कैसे उसके विचार पत्र के माध्यम से निकलते हैं पढ़िए – IMG source – http://i.huffpost.com/gen/1178281/images/o-LETTER-TO-EX-facebook.jpg प्रेमी  अपनी प्रेमिका से – प्रेमिका मेरी ओ प्राण प्यारी! तुम्हे एक पल हृदय से ना दूर किया…

अंतिम दृश्य (भाग -8 )

कुदरत भी क्या खूब खेलती है पहले खुद अंजान लोगों को एक दूसरे से मिला देती है , सारे मोह बंधन ,रिश्ते नाते बनाती है फिर एक क्षण में सब कुछ खत्म बाद में रह जाती हैं सिर्फ यादें और जब ऐसी यादें आती हैं तो साथ में अश्रु धारा अनायास ही निकल आती है ! शक्तिप्रसाद की स्थिति उस हंस के जैसी है जिसका जोड़ा अब टूट चुका है और हंसिनी के वापस आने की अब कोई उम्मीद बाकि…

अंतिम दृश्य   भाग-७

प्रतिदिन की भांति आज भी शक्तिप्रसाद सुबह भोर में उठकर नहा धोकर गांव के बाहर वाले शिव मंदिर पर पूजा करने गए थे , अब उन्हें ये कहाँ पता था आज होनी को कुछ और मंजूर है ,जैसे ही घर वापस आये हर रोज की भांति उन्हें लगा मधुमति चूल्हे पर चाय वगरह बना रही होगी मगर आज दृश्य पूर्णतयः परिवर्तित था , बाहर बरामद एकदम शान्त था और आज कोई बर्तन की आवाज भी नहीं आ रही थी !…

अंतिम दृश्य -६ 

दुःख और सुख दोनों एक दूसरे के संगी हैं , सुख आता है तो इसके पीछे पीछे दुःख भी चला आता है ! खैर बेटा बहु को शहर गये पूरा एक वर्ष व्यतीत हो गया है इस बीच दीपावली पर सभी लोग इकठठे हुए थे मधुमती का वश चलता तो दीपावली के त्यौहार को रमजान के सरीखा एक महीने लम्बा खींच देतीं मगर ये उसके नियंत्रण से बाहर की बात है आखिर उसका वश तो खुद के परिवार पर भी…

अन्तिम दृश्य भाग-५

आप कृपया कमरा खाली कर दीजिए ,मुझे सफाई.करनी. है ” ये भावुक आवाज थी हास्पिटल के सफाई कर्मी की.,.उसने ये बात बहुत संकोचवश बोली थी मानो अन्दर से हृदय उसे ये करने के लिये मना कर रहा हो वो कहते हैं ना “गन्दा है मगर धंधा है “! सभी को बाहर निकलवाना मजबूरी है उसकी वरना अपनों को ऐसी स्थिति में एक पल भी दूर करने का दर्द उसे अच्छे से पता है ! खैर सुधीर बाहर टहलने चला गया…

अन्तिम दृश्य _ भाग-२

​चाचा आप सो गये क्या बैठे – बैठे? रात काफी है, अगर नींद आ रही है तो मैं आपको घर छोड़ आऊं? ” – पीछे से सुधीर बड़े धीमे स्वर में बोला। “नहीं – नहीं! मैं जाग रहा हूं” -एक साथ सकपकाकर कर जमुनादास उठे, जाग तो रहे थे मगर आंखें ऐसे खुली जैसे गहरी नींद से उठे हों!  फिर आंखें मलते हुए बोले – “तुम अकेले रह जाओगे यहां, गम की रातें बहुत लम्बी हो जाती हैं, बेटा! एक…