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समाज का लेखकीकरण

वो कहते हैं ना, खुद को कितना भी रंगों में रंग लो, मगर एक दिन पानी पड़ते ही असली रंग दिख ही जाता है| कुछ दिनों से बयार सी चल पड़ी थी देश में शायर लेखकों की , फिर एक दिन आँधी आयी और सबके पत्ते खुल गये| कुछ दिनों से बयार सी चल पड़ी है, कविता ,कहानी लिखने और सुनाने की! इन सबके बीच बढ़ा है, लेखकों का धंधा! कोई नेम के चक्कर में फेमिनिज्म को बाहों में भर…

फ़िज़ा बिगड़ गयी है

दंगे फसादों का दामन नहीं छूट रहा, फ़िज़ाएँ बिगड़ गयी हैं मेरे देश में! तिरंगा फहराने पर भी मार काट होती है, शायद बहरूपिये रहने लगे हैं अब इंसानों के भेष में|

मैंने हकीकत देखी है

आज मैंने एक हक़ीक़त देखी, इंसान की गंदी सोच की हिमाकत देखी! कितने लोगों की नसीहत देखीं, नसीहत के पीछे सियासत देखी| ख़ुद चाहे दुनिया घूम आयें, बहन को घर में जकड़ने की हिमाकत देखी| मैंने झूठे लोगों को रोना रोते हुए, कुछ सच्चे लोगों की झूठी मुस्कुराहट देखी| कोई ख्वाब नहीं था वो, हक़ीक़त ही थी| हाँ मैंने कुछ कड़वी हक़ीक़त देखी|

Thought of the day 13jan

 नयी बुनियाद में जरूरत थी थोड़ी  पानी की तराई की, साजिशन यह काम एक फ़रेबी कारीगर ने लिया! फिर रोज़ पानी की अतिशयोक्ति की गयी, और ढहा दी गयी वो कच्ची नींव  पर टिकी बुलंद दीवार|