कठिनाइयों की मारामार,

ऊपर से विफलताओं का अचूक प्रहार!

निराशाओं से भ्रमित विचार,

जैसे रुक गया हो ये संसार||

 

मस्तिष्क का वो पृष्ठ भाग ,

कर रहा अलग ही भागम भाग!

गति तीव्र हो गयी है रक्त की शिराओं की,

दिशाएं भ्रमित हैं रक्तिकाओं की|

 

ये परिणाम है सब असफलता का,

सतत प्रयासों के बाद भी मिल रही विफलता का !

यह बात नहीं अब कोई विशेष है,

समर अभी शेष है|

 

परिस्थितियों ने किये हैं सहस्रों प्रहार

कसर रही नहीं कुछ बाकि है,

हो गया हो तुम्हारा प्रकोप लाने का प्रयास !

तो ध्यान रखो खेल में अगली मेरी बाजी है|

 

खेल का रंग अब देख चुका,

सारे पड़ाव मैं देख चुका!

हार का मुख मैं देख चुका ,

दिन में रात मैं देख चुका!

 

जीत का अंतर माप चुका,

गंम्भीर स्थिति भांप चुका!

हारी बाजियाँ खेल चुका,

अब तक कितना समय मैं ठेल चुका!

कभी निराशा कभी हताशा ,

मैं सारी परिस्थितियां झेल चुका।

 

कुछ बचा नहीं अब परिस्थितियों के पाले में,

शायद नयी चाल नहीं, अब उनके पाले में!

 

अबकी बाजी मैं खेलूंगा ,

हारा हुआ सब एक बार में वापस ले लूंगा!

कितने तनाव और कष्ट दिए ,

मैं सबका हिसाब ले लूंगा|

 

ऐ! परिस्थिति तुझे पहले ही करता हूँ,सावधान!,

बाद मैं मत कहना होकर हैरान,

की उस समय खेल पर नहीं था मेरा ध्यान|

 

तू अपनी चालें सब खेल चुकी है,

खेल में खेलने की मेरी अब बाजी है!

शेष समर है हमारे बीच ,

देखना रोमांच अभी भी बाकि है।




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