​वो मेरे अंतर्मन के बेनाम नगर में 

अमुक स्थान से निकलती संकरी राहों से गुजरने के बाद 

एक आवास श्रेणी है !

वहां कोई अज्ञात लोगों का पूरा समूह छिपा है ,

हाँ!एक दो नहीं हैं ,उनका तो पूरा झुंड है पूरा का पूरा !

शान्ति से रहें तो भी ठीक है ,

मगर वो अशिष्ट जन कोलाहल करते हैं

मैं ठहरा लाचार , निर्बल उनके सामने ,

आखिर अकेला प्राणी पूरे झुंड से कैसे लड़ाई करेगा!

वैसे एक नहीं हैं वो लोग 

मगर अच्छा होता अगर वो समूह में एक होते 

विचारधाराएं, परिकल्पनाएं , मार्ग, अभिलाषाएं सब एक होते 

मस्तिष्क – नगर में जाने के मार्ग ना अनेक होते !

दुर्भाग्य कहूँ या फिर मन की पिपासा

हाँ! सारी त्रुटियां मन ने ही तो की हैं ,

क्या जरूरत थी अंतर्मन – आवास श्रेणी में इतने रिक्त स्थान बनाने की ?

अब देख लो अज्ञात लोग अवैध कब्जा करके काल सर्प की भांति कुंडली मार के बैठे हैं !

फिर मैं विचार करता हूँ 

अच्छा ही तो है , जो यहां अनेकों रहते हैं 

वरना इतने बड़े रिक्तस्थान पर कोई

विशाल , वीरान , भुतहा खण्डहर होता !

जिन्न, छलावा और राक्षस ये सब यहां घर कर लेते 

उनके दुष्प्रभाव से शायद मैं भी कोई दानव होता !

अब मन पर प्रश्न चिन्ह लगाना छोटे मुंह बड़ी बात हो गयी

मेरा कद ही क्या है उसके सामने ?

शायद आपको नहीं पता होगा !

मैं भी तो उसी दुर्गम श्रेणी के एक आवास में रहता हूँ

शांत, एकदम अचल , द्वंद्वपूर्ण  विचारों से आच्छादित और असहाय

हाँ यही विशेषताएं उपयुक्त हैं मेरे लिए  !

हाँ एक बात है 

अपने ग्रह में स्थायी रूप से निवास करता हूँ

अब इसे आप मेरी हठवादिता कहो या फिर जुझारूपन 

या फिर आश्रित हूँ मैं 

मगर इन अज्ञात प्राणियों का क्या है ?

अस्थिरता इनके स्वभाव में है 

आज कोई यहां से जाता है तो कल दूसरा कोई रहने आ जाता है !

अनेकों विचार -धाराओं के चलते ये उद्दंडी झुंड कोलाहल बहुत करता है !



नमस्कार दोस्तों ,

जैसा कि आपने नोटिस भी किया होगा पहले के मुकाबले मेरी पोस्ट्स अब नहीं आ रहीं हैं , उसके लिए क्षमा चाहूँगा मुझे भी कुछ समझ नहीं आता आखिर क्यों ?

ऐसा नहीं है राइटिंग का मन नहीं करता !करता है मगर 24 घंटे से ज्यादा मेरे पास भी नहीं हैं सब कुछ करना चाहता हूं एक तरफ सोचता हूँ कुछ भी छूट ना जाये , ये भी कर लूं वो भी कर लूं 

मगर एक तरफ मन कहता है ये सब व्यर्थ की मोह माया है , शांति से रहो मगर फिर भी अंतर्मन अनेकों रूप धारण करके मुझे लगातार भ्रमित करता है कुछ ऐसी व्यथा को मैंने समय निकालकर लिखा है अगर आपको ये द्वंद अपना से लगता है तो विचार अवश्य देना !

धन्यवाद

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