कुण्ठा, बाध्यता और लोक लाज,

मगर हौसले हैं उसके जैसे पर्वत-पठार!

गृहस्थ वो बड़ी यत्न से चलाती है,

और ममता वात्सल्यता के समय

हिम गिरी सी पिघल जाती है|

” माँ “