सिहरते से आवेग कहीं ज्वालामुखी में लुप्त हो गए हैं,
सरसराते से मनोविचार भूकंप के रौद्र रूप से भयभीत हो गए हैं!

उफनते सी भावनाएँ, बाढ़ के प्रकोप में बह गयीं हैं,
आकाश में आशा की किरण नहीं दिखी,
माथे पर शिकन रह गयी है|

धैर्य की कच्ची प्राचीर इस बार की बारिश में ढह गई है,
प्रकृति रुष्ट है हमसे, शायद सत्कार में कुछ कमी रह गयी है|

शासन प्रशासन को सुध बुध नहीं है,
कृषि उनके लिए बस राजनीति बनकर रह गयी है,
कब मेघ बरसते हैं कोई ख़बर नहीं है?
इंद्रदेव को हमसे शायद कोई दुश्मनी हो गयी है|

अन्नदाता उपनाम मुझे कृपा पूर्ण मिला है,
मेरी स्थिति उसे अब धता बता रही है|

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