बहुत बार जीवन में लगातार असफलताएं मिलती हैं और हम इतने हतोत्साहित हो जाते हैं कि समझ नहीं पाते आखिर अब करना क्या है !

नकारात्मकता हम पर हावी होने लगती है ऐसे में किसी की कोई बात समझ नहीं आती फिर भी हमारे पास खुद को उत्साहित करने का मौका होता है जिससे हम काफी हद तक नियंत्रण पा सकते हैं वो है आत्मविश्वास !

कुछ ऐसे ही उद्देश्य से मैंने ये कविता लिखी है इसलिए शीर्षक देखकर भ्रमित नहीं होना—-

निराशा , हताशा कृष्ण मेघ के समान 

परिधि में आच्छादित करेंगी,

उपहास तिरस्कार और लोक लाज सब व्यर्थ में 

उलझाकर विचारों में कल्पित   करेंगी

 मगर वीर! तुम बढ़े चलो 

इतिहास नया तुम गढ़े चलो !

ये समस्त विश्व एक जंजाल है 

यहां दानव शक्तियां विकराल हैं 

क्योंकि घोर कलियुग का ये काल है !

वीर!तुम निष्ठावान बनो, तुम धैर्यवान बनो 

वीर !तुम सत्यवादी बनो , तुम आशावादी बनो !
ये समस्त मनुज कंगाल हैं 

अज्ञान के बेताल हैं मगर 

तुमको कोई भ्रमित करे ,

भला क्या किसी की मजाल है?

मार्ग में बाधा सहस्रों खड़ी हैं 

जाने कितनी कंटक बबूल पड़ी हैं ,

हृदय को बना लो 

अभी ना जाने कितनी विफलताएं प्रतीक्षा में खड़ी हैं !

वीर ! तुम भयभीत मत हो 

विपदा से अधीर मत हो ,

तुम दृढ़ और निर्भीक बनो 

रण योद्धा जैसे अजीत बनो !
तुम ज्ञान का कृपाण लो 

इसे परिश्रम से तुम धार दो ,

असफलता रूपी विशाल वृक्ष का

जड़ तना सब काट दो !
वीर !तुम रुको नहीं ,वीर तुम झुको नहीं !
राष्ट्र के नव चिराग हो तुम

तुम्हारे हस्तों में इसकी बागडोर है ,

एक क्षण भी ना भ्रमित रहो 

नकारात्मकता चारों ओर है !

तुम गंगा की तरह बनो 

सतत् शीतल और निर्मल रहो,

राष्ट्र हित के कार्यों में सदा चलायमान रहो 
वीर! तुम बढ़े चलो 

सुमार्ग पर बढ़े चलो !
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