मानवता की हदें भी करती,
पौरुष की निंदा हैं!
ए-नीच तेरे कुकृत्य से
सभी पुरुष शर्मिंदा हैं|

देख तेरी करतूतों को,
हैवानियत की हदें भी करतीं,
तेरी कठोर निंदा हैं!
जाने कितने फूलों को तूने तोड़ा है,
अब मासूम काली को भी नहीं छोड़ा है!
तेरा हवस प्रेम देख,
दरिंदगी भी तुझ पर कितनी शर्मिंदा है|
हाय! तू कैसा दरिंदा है|

चिता इन हवस के पुजारियों की जलानी होगी,
आग इन व्यभिचारियों को लगानी होगी!
कब तलक लुटती रहेंगी अबलाओं की आबरू,
किसी अर्जुन को फिर से गांडीव की प्रत्यन्चा चढ़ानी ही होगी|

गांडीव कौन उठाएगा?
प्रत्यञ्चा कौन चढ़ायेगा ?
खुद द्रोण यहाँ संलिप्त हुए हैं!
अब कोई कौन्तेय कहाँ बन पायेगा|
शायद स्वाध्याय और ठोकरों से बना
कोई एकलव्य अब आयेगा|

CONTENT CREDIT- कभी कभी दो तीन लोगों की आपसी चर्चा से एक बहुत अच्छा सन्देश निकलता है, आज की कविता के लिए मैं हर्षिता यादव और राकेश सिंह जी को बहुत धन्यवाद देना चाहूँगा, जिन्होंने इसे कविता का रूप देने की संकल्पना की!
आप दोनों का YOURQUOTE पर फॉलो कर सकते हैं-
हर्षिता यादव
राकेश सिंह जी

एवम राकेश जी ने नया ब्लॉग बनाया है आप उनके साथ यहाँ भी जुड़ सकते हैं|